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संभाजी महाराज की शौर्यगाथा, जिन्होंने राष्ट्र और धर्म के लिए किया मृत्यु का वरण

मेधा देशमुख पेशे से एक माइक्रोबायोलाजिस्ट हैं फिर भी उन्होंने शिवाजी के पुत्र संभाजी के जीवन पर शोधपरक किताब संभाजी महाराज- शिवाजी महाराज के सुपुत्र की शौर्यगाथा लिखने और पाठकों के सामने नए तथ्यों को सामने लाने का साहस किया है।
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संभाजी महाराज की शौर्यगाथा
भगत सिंह और बिरसा मुंडा के बलिदान ने जहां अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में चिंगारी का काम किया, वहीं मध्यकालीन भारत में भी एक ऐसा मराठा योद्धा हुआ, जिसके बलिदान ने मुगल काल के क्रूरतम शासक औरंगजेब की चूलें हिलाने का काम किया। छत्रपति शिवाजी महाराज की शौर्यगाथा के बारे में बहुत कुछ लिखा-पढ़ा गया है, लेकिन उनके पुत्र संभाजी महाराज के साथ इतिहासकारों ने वह न्याय नहीं किया, जो होना चाहिए था। उनके बारे में जिस स्पष्टता से देशवासियों को बताना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। हाल के वर्षों में अपने राष्ट्र नायकों की खोज खबर लेने का काम शुरू हुआ है तो कुछ लेखकों का ध्यान एक बार फिर संभाजी पर गया है। मेधा देशमुख भास्करन न तो इतिहासकार हैं, न ही अकादमिक जगत से जुड़ी हैं। वह पेशे से एक माइक्रोबायोलाजिस्ट हैं। फिर भी उन्होंने संभाजी के जीवन पर शोधपरक किताब 'संभाजी महाराज- शिवाजी महाराज के सुपुत्र की शौर्यगाथा' लिखने और पाठकों के सामने नए तथ्यों को सामने लाने का साहस किया है।
यह पुस्तक मूलत: अंग्रेजी में लाइफ एंड डेथ आफ संभाजी का हिंदी अनुवाद है। चार खंडों और 36 अध्यायों में उपन्यास शैली में लिखी यह पुस्तक न सिर्फ संभाजी की शौर्यगाथा बताती है, बल्कि उनसे व्यक्तित्व की तमाम परतों को खोलती है। जैसे कि संभाजी विलासी थे या योद्धा? वे मुगलों के खेमे में शामिल हो जाने वाले देशद्रोही थे या मराठा राष्ट्र-स्वराज के रक्षक? वे अपने पिता के मंत्रियों के हत्यारे थे या न्याय के पक्षधर? वे छत्रपति शिवाजी के गंवार पुत्र थे या वे कई भाषाओं के विद्वान और कवि? वे तांत्रिक कर्मकांड में विश्वास करते थे या एक सैन्य रणनीतिकार थे?
पुस्तक के चार खंड कालखंडों में बांटे गए हैं। ये वर्ष 1674 से 1689 तक औरंगजेब और मराठा शासकों का वृत्तांत पेश करते हैं। इससे पहले प्रस्तावना में मात्र नौ साल की उम्र में संभाजी के वर्ष 1666-67 में मथुरा से औरंगजेब के बिछाए जाल से सकुशल निकलकर रायगढ़ किले तक पहुंचने की घटना का सजीव चित्रण किया गया है। पहले अध्याय का आरंभ संभाजी की मराठा राष्ट्र के युवराज के रूप में ताजपोशी से होता है। फिर तो यह पुस्तक जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे मुगलों की क्रूरता और अपने धर्म संस्कृति, देश-समाज की रक्षा और उसे आगे बढ़ाने में रत मराठा संभाजी की वीरता और बलिदान की गाथा कहते हुए पाठक को उसी दौर में पहुंचा देती है। संभाजी ने 31 साल की आयु में ही सौ से अधिक युद्ध लड़े और सभी में उनकी जीत हुई। इस बीच उन्होंने बुधभूषणम, नायिकाभेद, सातशातक और नखशिखांत जैसे संस्कृत ग्रंथों की रचनाएं भी की थीं। पुस्तक की विशेषता यह भी है कि पाठक को लगता है कि वह उन किलों में स्वयं उपस्थित है।
अंतिम अध्याय का चित्रण बहुत मार्मिक ढंग से किया गया है। वह समय था, जब संभाजी और उनके अनन्य मित्र कवि कलश औरंगजेब की गिरफ्त में आ जाते हैं। हालांकि उनके सामने जीवन और दर्दनाक मौत में से किसी एक को चुनना था। जीवन चुनने का मतलब हिंदू धर्म और अपनी मिट्टी से जुड़े असंख्य लोगों की स्वतंत्रता को मुगलों के पैरों में गिरवी रख देना था। यह संभाजी को मंजूर नहीं था, क्योंकि शिवाजी ने बचपन में ही यह घुट्टी उन्हें पिला दी थी कि स्वतंत्रता के बढ़कर जीवन में कुछ नहीं होता। अपने पिता की दी हुई सीख का मान रखते हुए उन्होंने मृत्यु का वरण किया। औरंगजेब ने उनके साथ अत्यंत बर्बरता की। ऐसा ही उसने सिखों के नौवें गुरु तेगबहादुर जी के साथ किया था। वर्ष 1689 में संभाजी की मृत्यु के समाचार ने मराठों के दिलों में ऐसी अग्नि प्रज्वलित की कि उसमें औरंगजेब का दक्कन जीतने का सपना जलकर भस्म हो गया। जो लोग संभाजी को संदेह की दृष्टि से देखते हैं, उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।